कुलपति प्रो० सञ्जीव कुमार शर्मा ने किया भारत विद्या केन्द्र का उद्घाटन
मोतिहारी।पु0च0
महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो० सञ्जीव कुमार शर्मा जी के द्वारा भारत विद्या केन्द्र का उद्घाटन किया गया। इस उद्घाटन कार्यक्रम का शुभारम्भ चाणक्य परिसर के पं० राजकुमार शुक्ल सभागार में कुलपति प्रो० सञ्जीव कुमार शर्मा, प्रति-कुलपति प्रो० जी गोपाल रेड्डी, इस केन्द्र के समन्वयक प्रो० प्रसून दत्त सिंह तथा चाणक्य परिसर के निदेशक प्रो० आनन्द प्रकाश द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इस ऐतिहासिक क्षण में अपने अध्यक्षीय उद्वोधन में कुलपति प्रो० सञ्जीव कुमार शर्मा ने केन्द्र के स्थापना के उद्देश्यों पर विस्तृत चर्चा करते हुए यह बताया कि भारत विद्या केन्द्र की स्थापना भारतीय ज्ञान विज्ञान की परम्परा तथा भारतीय संस्कृति कला एवं इतिहास की नवाधुनिक दृष्टि से वैज्ञानिक विमर्शों को समुद्घाटित करने हेतु की गई है, जिससे भारत की विलक्षण बौद्धिक परम्परा का संज्ञान न केवल भारतीयों को अपितु विश्व के सभी चिन्तकों को हो सके। कुलपति ने यह भी बताया कि भारत विद्या केन्द्र महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक धरा को पुनर्जीवन प्रदान करेगा, जिसमें भारतीय दर्शन, भाषा, संस्कृति, लोक कला एवं अन्य ज्ञान-विज्ञान के अविर्भाव की साक्षी इस धरती को पुनः उपजाऊ बनाने में एक सशक्त उपकरण का काम करेगा। विश्वविद्यालय के प्रति-कुलपति प्रो० जी गोपाल रेड्डी ने भारत विद्या केन्द्र के विकास हेतु अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि यह केन्द्र भारत की समावेशिक संस्कृति के उत्थान हेतु निश्चित ही अनेक शोध कार्य एवं अकादमिक विमर्शों का आयोजन करेगा, जिससे भारत एवं भारतीय संस्कृति के गौरव की पुनःस्थापना हो सकेगी। मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री (महामहोपाध्याय) प्रो० अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने अपने व्याख्यान में भारतीय संस्कृति की विलक्षणता एवं भारतीय संस्कृति का विश्व की अन्य संस्कृतिओं पर प्रभाव को अत्यन्त ही सन्दर्भ सहित लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रो० मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी है। अन्य सभी संस्कृतियां भारतीय संस्कृति से समृद्ध हुई है। अतएव भारतीय संस्कृति एवं अन्य संस्कृतियों के मध्य दाता एवं ग्रहणकर्ता का सम्बन्ध है। भारतीय संस्कृति वह सनातन संस्कृति है जो वैश्विक परिदृश्य में चिन्तन करती है। यह संस्कृति सम्पूर्ण विश्व को परिवार के सिद्धान्त का पाठ पढ़ाती है। यह संस्कृति सनातन ज्ञान तथा प्रत्येक जीव में ईश्वर की सत्ता को बताती है, जिसे अन्य संस्कृतियों में विविध नामों से जाना जाता है। प्रो० मिश्र का कहना है कि भाषा धर्म का पर्याय नही है। अरबी भाषा भी संस्कृत की तरह उतनी ही पुरानी है, जिसमें भारतीय संस्कृति के सिद्धान्तों का विशद् चिन्तन प्राप्त होता है। पारसी धर्म का ग्रन्थ जेद-अबेस्ता वेद से पूर्णतः अनुप्राणित है। वेद के ज्ञान के बिना जेद-अबेस्ता को अच्छी तरह से नहीं समझा जा सकता है। अरबी भाषा एवं संस्कृत भाषा के ज्ञान से अरब देश के विविध संग्रहालयों में संरक्षित प्राचीन ग्रन्थों के पुनः अध्ययन से भारत विद्या की वैश्विक उपादेयता को पुनः स्थापित किया जा सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और गुजरात सरकार के महिला एवं बाल विकास के निदेशक श्री अशोक शर्मा जी ने अपने विशिष्ट व्याख्यान में गीता जयन्ती के दिन भारत विद्या केन्द्र के उद्घाटन को अत्यन्त ही शुभ क्षण के रूप में इङ्गित किया तथा इस केन्द्र में अध्यात्म विद्या के विमर्श को वैश्विक स्तर पर लाने के लिए अनेक सुझावों को प्रदान किया। श्री शर्मा ने कहा कि भारत की पहचान अध्यात्म से है। अध्यात्म के द्वारा ही भारत पुनः विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठापित हो सकता है। इसलिए प्राच्य विद्या में निहित अध्यात्म के गूढ़ तत्त्वों का इस केन्द्र के द्वारा वैज्ञानिक शोध एवं चिन्तन करना चाहिए। इस अवसर पर केन्द्र के संयोजक प्रो० प्रसून दत्त सिंह ने अपने अभिभाषण में कहा कि यह केन्द्र आने वाले समय में भारतीय विद्या और ज्ञान गंगा को यथार्थ रूप में विश्वविद्यालय की धरा पर लाने का कार्य करेगा, साथ ही भारत विद्या केन्द्र भारत के ज्ञान को उन्मेषित करने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के चाणक्य परिसर के निर्देशक प्रो० आनन्द प्रकाश, उपकुलसचिव डॉ० ज्वाला प्रसाद, गाँधी भवन परिसर के निदेशक प्रो० राजीव कुमार, समाज कार्य विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ० विजय कुमार शर्मा, गाँधी एवं शान्ति अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० सुनील महावर, संस्कृत विभाग के सहाचार्य डॉ. अनिल प्रताप गिरि, सहायकाचार्य श्री विश्वजित वर्मन तथा विभिन्न संकायों के संकाय प्रमुख, विभागाध्यक्ष, शिक्षक एवं कर्मचारीगण तथा बड़ी संख्या में छात्र एवं छात्राएँ ऑनलाईन ऑफलाईन माध्यम से जुड़े रहे। कार्यक्रम का सञ्चालन संस्कृत विभाग के सहायकाचार्य डॉ० विश्वेश वाग्मी एवं धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ सहाचार्य डॉ० श्याम कुमार झा ने किया। राष्ट्रगान से कार्यक्रम का समापन हुआ।

