एक विस्मृत योद्धा – वैशाली के महान विभूति और ग़ांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री युगेश्वर बाबू उर्फ़ भुल्लर बाबू
(पुण्य तिथि- 3 जनवरी)
देश के लिए जान की बाज़ी लगा देने वाले, देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर तन मन एवं धन से देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाने वाले युगेश्वर बाबू उर्फ़ भुल्लर बाबू भले ही इतिहासकारों के सौतेले व्यवहार के शिकार हुए लेकिन उनके प्रदेश के लोगों ने हमेशा उन्हें अपने दिल में रखा|
भूल गये हम भुल्लर को
बीसम बीसा (2020) अब समाप्त होने वाला है। जिस अच्छे दिन आने की उम्मीद हम लिए बैठे हैं। वह दिन अब अधिक दूर नहीं है। 2021 की जनवरी में हम जिस गण तंत्र की स्थापना के हम 71 वां वर्ष मनायेंगे उसी गणतंत्र की प्राचीन भूमि वैशाली की मिट्टी पर पैदा हुए पैदाइशी गणतंत्र के लाल स्वतंत्रता सेनानी भुल्लर ठाकुर को हम भुलक्कड़ उन्हें भूलने , भुला देने , या भूल जाने की सहज कोशिश करेंगे । हमें यह गणतंत्र तो पसन्द है ।इस गणतंत्र को याद करने के लिए सालाना जश्न भी जरूरी है। लेकिन जैसे नींव के पत्थर का कोई कद नहीं होता उसी तरह कुछ फ्रीडम फाइटर विस्मृति के गर्भ में ऐसे रख दिये जाते हैं जो कभी याद न आएं। बिहार राज्य में ऐसे भुल्लर अकेले नहीं हैं । आज़ादी की पीढ़ी भी अब 71 साल की हो गयी यानी वे भी बूढ़े हो चले । कौन याद रख सकता है। आने वाली पीढ़ियों को देने के लिए हमारे पास कुछ भी बेहतर नहीं हैं। ऐसे में एक पूरी की पूरी सभ्यता संस्कृति का सर्वनाश हो जाना असंभव नहीं है।
गणतंत्र की एक प्राचीन परम्परा की सर्वख्यात धरती पर 25 जून 1900 ई को भुल्लर ठाकुर का जन्म हुआ तथा 3 जनवरी 1984 को वे गोलोक वास को चले गए।
आगामी 3 जनवरी को उनकी 37 वीं पुण्यतिथि है।
गौरव शाली वैशाली की गणतांत्रिक धरती पर बुद्ध , महावीर और गणिका आम्रपाली ने न केवल भारतीय आध्यात्म को समृद्ध किया है वल्कि सामाजिक जीवन की ओर ध्यान रखना भी सिखाया है । इस धरती की ऐतिहासिक समृद्धि से आकर्षित होकर गांधी ने बिहार की इस अनमोल मिट्टी को अपने कर्मभूमि के लिए चुना । यह आकस्मिक नहीं था ।इसके पीछे कहीं न कहीं वैशाली और उसका गणतंत्र था। इस मिट्टी की अपनी स्वच्छंदता थी ।अपनी स्वतंत्रता थी । अपना उन्मुक्त दर्शन था ।जो इस मिट्टी पर पैदा होने वाले हर व्यक्ति के स्वभाव में देखा परखा जा सकता था। गांधी की अंतरदृष्टि ने इसे समझने में भूल नहीं की।
कौन थे भुल्लर
युगेश्वर प्रसाद ठाकुर उर्फ भुल्लर ठाकुर का जन्म भूमिहार कुल में वैशाली जिले के अंतर्गत पटेढ़ी बेलसर प्रखंड के अधीन मानपुरा गांव में एक किसान परिवार में हुआ। यह परिवार पूरी तरह कॄषक परिवार ही था । आय के अन्य श्रोत नहीं थे इस कारण सामान्य खर्च के लिए अनाज बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं था इस कारण तंगदस्ती बनी रहती थी । गांव के ही स्कूल में इनकी पढ़ाई हुई। स्वभाव से अपनी धुन में ही खोये खोये रहते थे । सो साथियों ने इन्हें भूल्लर कहना शुरू किया ।कालान्तर में यही नाम प्रचलित हो गया। 17 वर्ष की अवस्था तक अपने गाँव में ही रहे। अपने संगी साथियों के बीच मितभाषी और मितव्ययी के रूप में जाने जाते थे। 1917 से 1921 तक ये गांधी दर्शन से प्रभावित रहे ।गांधी के हर आह्वान में अपने समकालीन संगी साथियों के साथ जुट जाना ,कार्य को अंजाम तक ले जाना ही इनका उद्देश्य होता था। इनके समकालीनों में बैकुंठ शुक्ला, अक्षयवट राय, बसावन सिंह,सुदर्शन सिंह,बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री स्व ललितेश्वर प्रसाद शाही एवम गुलज़ार पटेल के नाम उल्लेखनीय हैं।
और न जाने ऐसे कितने वीर सपूतों के साथ काम किया सभी की पूरी सहभागिता से स्वतंत्रता आंदोलन में वैशाली की मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेर दी ।इन वीरों ने भारतीय स्वाधीनता के लिए अपने घर परिवार ,मां बाप और भाई बहन तक की परवाह नहीं की और भारत मां की आजादी के लिए जान की बाजी लगा दी। इन वीरों ने इस संग्राम में न जाने कितने कोड़े और लाठियां खाईं ,जुल्म और यातनाएं सहीं । ये वीर निश्चित रुप से कृतसंकल्पित थे ,कि हमें देश के लिए जीना और मर जाना है ,और इन्होंने वे सभी काम किए जो एक देश के लिए समर्पित क्रांतिकारी करते हैं।
भुल्लर ठाकुर का योगदान
17 वर्ष के भुल्लर की युवा मानसिकता को गांधी ने खूब प्रभावित किया ।गांधी के प्रति उनका समर्पण ,उनकी श्रद्धा ने अंग्रेजों की लाठियाँ झेलने ,जेल की कठोर यातनाएं झेलने के धैर्य और साहस प्रदान किया।गांधी जी के हर आह्वान पर वे अपने माता पिता , भाई बहन के प्रेम को एक तरफ रखकर असहयोग आंदोलन, से लेकर 1942 की क्रांति तक न जाने कितनी बार जेल गए , छूटे फिर गये । जेल उनके लिये अस्थायी निवास हो गया था ।1942 में जब अंग्रेजो भारत छोड़ो का आंदोलन हुआ तो अंग्रेजो की सख्ती ने इन युवाओं के मन में आक्रोश भर दिया और दूने उत्साह के साथ वैशाली का यह वीर सपूत एक क्रांतिकारी सेनानी के रूप में जाना जाने लगा ।स्वभाव से फकीर भुल्लर ने इस प्रकार देश की सेवा की,जिसके एवज में आज़ादी के बाद भारत सरकार ने अन्य सेनानियों की तरह इन्हें भी पेंशन की स्वीकृति 1971 में प्रदान किया । वे किसी प्रकार अपना जीवन यापन करते रहे । 15 अगस्त और 26 जनवरी के अवसर पर तिरंगा झंडा के साथ प्रभात फेरी करना । गाँव के सभी बच्चों को लेकर स्वतंत्रता का मतलब समझाना उनकी आदत में शुमार था।मात्र 13 वर्षों तक वे पेंशन का आर्थिक लाभ ले सके । 3 जनवरी 1984 को वैशाली का यह क्रांतिवीर दुनियाँ को अलविदा कह कर चला गया।
भुल्लर ठाकुर के प्रति इतिहास लेखकों की उदासीनता
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वैसे क्रांतिकारी जो देश की सेवा किये जाने के बदले में देश से कुछ लेना पाप समझते थे उनकी एक अलग जमात थी । कुछ वैसे भी थे जो सत्ता सुख भोगने के व्यामोह में फंसे हुए थे। उस वक्त कांग्रेस पार्टी ही समूचे देश में सत्तासीन होने के लिए तैयार बैठा थी। वैशाली जिले में ही कई ऐसे फ्रीडम फाइटर थे जिन्होंने आज़ादी के बाद देश चलाने की मुहिम में शामिल हुए। उनमें युगेश्वर ठाकुर उर्फ भुल्लर ठाकुर के समकालीन सहयोगी भी थे।। ठीक इसीवक्त वामपंथियों ने बंगाल से ही स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन की शुरुआत की जिसे तत्कालीन कांग्रेसियों ने मनमाने ढंग से लिखवाया । यही कारण है कि जमीनी स्तर के क्रांतिकारियों को हाशिये पर रख दिया गया। यह दुष्कर्म केवल भुल्लर ठाकुर के साथ ही नहीं हुआ वल्कि ये सच्चे सपूत अपने आगे की पीढ़ी के सामने भी अपनी पहचान नहीं रख सके। लेकिन इसे कब तक छिपाया जा सकता था । सेनानियों की तीसरी पीढ़ी ने उन्हें ढूंढना आरम्भ किया है । आज ऐसे ही कितने भुल्लर की खोज की जा रही है ।रोज दर रोज बेईमान इतिहासकारों की बेईमानियां प्रकट हो रही हैं। भुल्लर के प्रपौत्र श्री अमित कुमार एवम विक्रम कुमार ने अपने पितामह को आगे किया है ।उनकी स्मृति में फाउंडेशन का गठन भी किया है।
स्व भुल्लर ठाकुर स्मृति फाउंडेशन क्या है
स्व युगेश्वर ठाकुर उर्फ भुल्लर ठाकुर स्मृति फाउंडेशन स्वतंत्रता सेनानी के पैतृक गांव पटेढ़ी बेलसर में एक स्वयं सेवी संस्था है।उनके पौत्र अमित कुमार एवम श्री विक्रम कुमार ने इस फाउंडेशन के तहत गाँव में सामाजिक चेतना को विकसित करने, स्वतंत्रता के मूल्यों को समझने , पर्यावरण को संतुलित रखने , सरकार की कल्याणकारी नीतियों को जनता के बीच रखने आदि के उद्देश्य से गठित किया है ताकि स्व ठाकुर के सपनों को पूरा किया जा सके। फाउंडेशन के अध्यक्ष विक्रम कुमार के नेतृत्व में गुरुकुल नामक शिक्षा केन्द्र खोला गया है जहां बच्चों को मुफ्त पढ़ाया जाता है । फाउंडेशन द्वारा हजारों पेड़ लगाए गए हैं। स्थानीय युवाओं की भागीदारी ने इसे नया आयाम दिया है । प्रतिवर्ष स्व ठाकुर की जन्मतिथि पर सैकडों दीप जलाये जाते हैं ताकि अगली पीढ़ी को क्रांतिवीर के कृत्यों की जानकारी रह सके।
समाज की सेवा में खर्च कर देते थे पेंशन की राशि
गांधी के आह्वान पर मर मिटने वाले युगेश्वर ठाकुर उर्फ भुल्लर ठाकुर को 1942 में अंग्रेजो का रास्ता रोक देने के कारण उन्हें घोड़ों में बांधकर दौड़ाया गया था । इतनी अमानवीय यातना उनके समकालीन सहकर्मियों को भी नसीब नहीं हुई। इस तरह की पीड़ा झेलना वह भी देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए , उच्चतम मानसिक स्थिति का ही परिचायक है। वेशक , स्व भुल्लर का त्याग अलग किस्म का था । 1971 में जब उन्हें पेंशन दिया जाने लगा तो उसकी अधिकांश राशि गरीब विद्यार्थियों की फीस देने , जरूरत मंद व्यक्ति को दान देने में ही चला जाता था। उन्होंने अथक परिश्रम कर अपने गांव मानपुर में मध्य विद्यालय की स्थापना कराई ताकि उस गांव के लड़के लडकिया मिडिल स्कूल की पढ़ाई आने गांव में ही करे ।इस हेतु पेंशन से जमा की गई राशि स्कूल में दान कर दिया करते थे। समाज को जितना सम्भव हो सका , दिया लेकिन बदले में कुछ लिया नहीं।
भुल्लर ठाकुर के सहकर्मियों की सियासती गतिविधियां
बेशक, भुल्लर ठाकुर ने बिहार की सियासत में खुद को आगे नहीं किया जब कि उनके साथ जेल जाने वाले बिहार के दिग्गज नेता ललितेश्वर प्रसाद शाही , डॉ गुलजार पटेल आदि ने सत्ता सुख का भरपूर उपयोग किया। उनके वंशज भी लाभान्वित हुए । डॉ गुलजार पटेल के पुत्र श्री वृषण पटेल और एल पी शाही के पुत्र स्व हेमंत शाही एवम उनकी पुत्रवधु वीणा शाही बिहार राज्य में मंत्रिपद भी सम्हाला।लेकिन भुल्लर ठाकुर न तो बिहार की राजनीति में शरीक हुए ना ही उनके पुत्र या पौत्र सियासत के गलियारे में कदम रखने की कोशिश की।यद्यपि स्व. एल पी शाही द्वारा स्व. यूगेश्वर ठाकुर उर्फ भुल्लर ठाकुर के गांव में स्थापित मध्य विद्यालय में उनकी प्रतिमा लगवाने ,पुस्तकालय,स्कूल को उत्क्रमित करने , आदि के लिए सरकार से बार बार अनुरोध किया लेकिन सरकार द्वारा कोई पहल नहीं की गई है। अगले वर्ष सरकार स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ मनाने की जोरदार तैयारियां कर रही है ।बिहार राज्य का प्रबुद्धजन चाहेगा कि राज्य के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास को फिर से दर्ज करे तथा उचित सम्मान प्रदान करे ।यह भी देखे कि जिस सेनानी ने बाल बच्चों का मोह त्याग कर प्राणों को न्यौछावर कर दिया उनके वंशज रोजी रोजगार के लिए न भटकें।


