Type Here to Get Search Results !

किसान विरोधी तीनों कृषि-कानून व बिजली बिल 2020 वापस लो* *बिहार में एमएसपी पर सभी किसानों-बटाइदारों के धान खरीद की गारंटी करो, मंडी व्यवस्था बहाल करो*

 *किसान विरोधी तीनों कृषि-कानून व बिजली बिल 2020 वापस लो*



*बिहार में एमएसपी पर सभी किसानों-बटाइदारों के धान खरीद की गारंटी करो, मंडी व्यवस्था बहाल करो*




*पंजाब व देश के किसान आंदोलन के साथ एकजुट हों, साथ दें और आंदोलन को तेज करें*


*एआईकेएससीसी-बिहार के आह्वान पर 29 दिसंबर को राजभवन मार्च (पटना) में हजारों की संख्या में किसान भाग लें*


*15 से 29 दिसंबर तक जारी रहेगा किसान बचाओ - देश बचाओ अभियान*


*तीन कृषि कानून विरोधी किसान संघर्ष यात्रा व किसान-बटाईदार पंचायत को सफल करें*


वॉइस ऑफ इंडिया के संवादाता रामाधार साहनी के साथ ठाकुर वरुण कुमार की खास रिपोर्ट।


नई दिल्ली::- अखिल भारतीय किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमिटी, के बिहार राज्य इकाई ने किसान भाइयों व नागरिक बंधुओ से आह्वान किया है कि,


देश में तीन किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ आजादी के बाद का सबसे बड़ा व ऐतिहासिक किसान आंदोलन जारी है और केंद्र की मोदी सरकार व भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत आंदोलन को गुमराह करने और तोड़-फोड़ मचाने में झोंक दी है. वे इस ऐतिहासिक आंदोलन के खिलाफ तरह-तरह के कुप्रचार में लिप्त हैं. इस बीच 12 दिसंबर को उद्योगपतियों के सबसे बड़े संगठन (फिक्की) के सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बड़े काॅरपोरेट घरानों से कृषि की ओर रुख करने और बड़ा पूंजी निवेश करने की अपील की. इसके पूर्व कोरोना काल में ही 7 मई को भूमि उपयोग का परिवर्तन की इजाजत देते हुए भाजपा सरकार ने अडानी ग्रुप को एग्रो प्रोडेक्ट के लिए ‘वेयर हाउस’ बनाने की अनुमति दे ही है और अडानी-अंबानी के सैंकड़ों अनाज- गोदाम बनकर तैयार हैं. गोदाम पहले बन गए फिर कानून बने हैं. दरअसल, बड़े काॅरपोरेट घरानों से प्रधानमंत्री की जो ‘मन की बात’ है, वही किसान आंदोलन का आरोप है कि मिस्टर मोदी देश की खेत-खेती पर काॅरपोरेट वर्चस्व थोप देना चाहते हैं, देश को खाद्य असुरक्षा और बड़े संकट में धकेल देना चाहते हैं. आइए, जरा पहले हम 2020 में कोरोना काल में लाए गए तीन कानूनों को देखें -


1. कृषि उपज वाणिज्य - व्यापार ( संवर्धन व सुविधा ) कानून 2020 - इस कानून के तहत खाद्यान्न के संपूर्ण खरीद के लिए निजी व्यापारियों को खुली छूट दे दी गई है. सरकारी शब्दावली में यह कानून राज्य कृषि उपज विपणन कानून के तहत अधिसूचित बाजारों के अहाते के बाहर अवरोध मुक्त अंतरराज्य और अन्य राज्यों के साथ व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देगा. कृषि मंत्री के अनुसार ‘‘यह देश में व्यापक रूप से विनियमित कृषि बाजारों को खोलने का एक ऐतिहासिक कदम है.’’


यह कानून राज्य के अधिकारों का अतिक्रमण करता है. इसमें कहीं पर चर्चा नहीं है कि निजी व्यापारियों को सरकार द्वारा घोषित फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे नहीं खरीदना होगा. इसका सीधा मतलब होगा कि मंडियों की एमएसपी पर बची-खुची खरीद सरकारी अड़चनों व शिथिलता से खत्म होती जाएगी और बाहर बैठे निजी व्यापारी किसानों से मनमाने कीमत पर फसलों की खरीद करेंगे. फसलों की न्यूनतम गारंटी कीमत भी नहीं रह जाएगी. सरकार जिसे हर जगह बेचने की आजादी कह रही है, दरअसल वह किसानों को अपनी फसल की मामूली कीमत के लिए गिड़गिड़ाने की स्थिति तक पहुंचाने वाला है.


2. आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) 2020 - 1955 के बने इस कानून में संशोधन कर खाद्यान्न वस्तुओं - तेलहन, दलहन, आलू, प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया है. इससे व्यापारियों को इन वस्तुओं के अकूत भंडारण का अधिकार मिल गया है. अब इनके अतिशय भंडारण पर सरकारें जमाखोरी, कालाबाजारी कानून के तहत जमाखारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकतीं.


इसका सीधा मतलब है कि बड़े काॅरपोरेट घराने व व्यापारी उपज के समय सस्ते दर पर आलू , प्याज, तेलहन, दलहन किसानों से खरीद लेंगे और इसका लाखों टन भंडारण कर अपनी शर्ताें पर ऊंची कीमत पर बाजार में बेचेंगे. जानकारी के लिए बतातें चलें कि यह कानून 1943 में बंगाल के भीषण अकाल जिसमें 30-35 लाख लोग भूख से मरे थे, के बाद मुल्क आजाद होने के बाद बनाया गया था. अकाल के दौरान जमाखारों ने खाद्यान्नों का अकूत भंडारण कर इन्हें काफी महंगे दर पर बेचा था और महंगे अनाज को खरीद पाने में अक्षम गरीब मौत की नींद सो रहे थे.


3. मूल्य आश्वासन (बंदोवस्ती एवं संरक्षण) कृषि सेवा कानून 2020 - सरकारी वक्तव्य के अनुसार कृषि व्यवसाय फर्म, प्रोसेसेरों, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों, बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ जुड़े रहने और किसानों को उचित व पारदर्शी रीति से खेती सेवाओं और लाभकारी मूल्य पर भावी खेती उत्पादों की बिक्री में कृषि करार के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क प्रदान करने हेतु इस कानून को लोने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है. यह और कुछ नहीं बल्कि काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग का केंद्रीय कानून है.


अभी तक पंजाब, हरियणा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कांट्रेक्ट फार्मिंग एपीएमसी एक्ट 2003 के तहत सीमित पैमाने पर हो रही है और इसमें लगी बड़ी व मुख्य कंपनियां आईटीसी, गोदरेज, रिलायंस, मेट्रो, अडानी, हिन्दुस्तान लिवर, कारगिल, पेप्सिको, मैक्केन, टाटा, महिन्द्रा, डीसी एम, श्रीराम, पतंजलि, मार्स रिगले कन्फेक्शनरी आदि हैं.


ठेका खेती/कांट्रेक्ट फार्मिंग का मतलब यह है कि किसान अपनी जमीन पर खेती तो करता है लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए. इसमें कंपनी ही तय करेगी कि कौन सी फसल उगानी है. बीज, खाद आदि का फैसला भी कंपनी ही करेगी. जाहिर है कंपनी उसी फसल को उगायेगी जिसमें ज्यादा मुनाफे की संभावना होगी. उदाहरण के लिए अगर कंपनी को लगेगा कि जेट्रोफा (बायो डीजल में काम आने वाला) की खेती में फायदा है, तो वह जेट्रोफा की खेती करवायेगी. किसानों की स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी और वे कंपनी के गुलाम बन जायेंगे.


किसानों को खाद्यान्न के लिए बाजार पर निर्भर रहना पड़ेगा. उत्पादित फसल का दाम बाजार में गिरने पर कंपनी नुकसान का रोना रोकर किसानों का भुगतान कभी भी फंसा सकेगी. कंपनी की ओर से समय पर भुगतान नहीं मिलने पर किसानों के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो जाएगा.


औपनिवेशिक भारत में मुनाफा कमाने के लिए अंग्रेज भारत के किसानों से जबरन नील की खेती करवाते थे. हर किसान को अपनी कुल खेती में प्रत्येक 20 कट्ठा में 3 कट्ठा नील की खेती के लिए देना पड़ता था जिसे तीन कठिया प्रथा कहते थे. हमारे ही बिहार में निलहे किसानों को शोषण से मुक्ति के लिए महात्मा गांधी ने चंपारण किसान सत्याग्रह 1917 में छेड़ा था. और आज 103 बरस बाद आजाद भारत में मोदी सरकार किसानों के शोषण के लिए अंग्रेज निलहों की तरह कंपनियों को छूट दे रही है.


बिजली बिल 2020 - हालांकि यह प्रस्तावित है लेकिन किसान आंदोलन के दौरान अपने भेजे गए प्रस्ताव में इसे नहीं लाने का कोई सुझाव सरकार ने नहीं दिया है. यह बिजली के संपूर्ण निजीकरण का प्रस्तावित बिल है जिसमें सभी प्रकार की सब्सिडी को समाप्त करने व वर्तमान दरों से बिजली की दरों को 4-5 गुना बढ़ाने का प्रस्ताव है. डीजल की आसमान छूती दरों व नए बिजली बिल से किसानों के कृषि उत्पादन लागत के दुगुना हो जाने का ही अनुमान है, आमदनी दुगुनी हो या न हो.


कुल मिलाकर मोदी सरकार कृषि सुधारों के नाम पर इन कानूनों के जरिए देश की खेती-किसानी और कृषि बाजार को देशी-विदेशी कंपनियों, काॅरपोरेट घरानों के हवाले समर्पित करने की रणनीति पर चल रही है. उसने देश के संसाधनों, बैंक, बीमा, रेलवे आदि सार्वजनिक उपक्रमों को एक-एक कर उन्हीं के हाथ में सुपुर्द करने का निर्णय ले लिया है. उसने इसी रूप में कोरोना संकट काल को अवसर में बदला है.


आज देश और खासकर पंजाब के किसान बिल्कुल वाजिब तौरपर आॅल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमिटी (एआईकेएससीसी) और पंजाब के 32 किसान संगठनों व देशभर के अन्य किसान संगठनों के नेतृत्व में देश की राजधानी दिल्ली और पूरे देश में आंदोलन के मोर्चे पर डटे हुए हैं. सरकार द्वारा अध्यादेश लाने के दौर से जून-जुलाई से ही किसानों ने संघर्ष का बिगुल फूंक दिया था. देशभर में चक्का जाम हुआ. पंजाब में किसानों ने लगभग महीनों भर रेल की पटरियों, रिलायंस-अडानी के पेट्रोल पंपों, माॅलों पर धरना दिया. दिल्ली कूच की हजार बाधाओं को पार करते हुए लाखों किसान दिल्ली की सरहद पर शांतिपूर्ण धरने पर डटे हुए हैं.किसान आन्दोलन के समर्थन में 8 दिसम्बर का शानदार भारत बंद हुआ. अबतक 20 से ज्यादा किसान मौत को गले लगा चुके हैं. लेकिन उनका असीम धैर्य, उत्साह व दृढ़ संकल्प इतिहास की एक नई इबारत लिख रहा है.


मोदी सरकार संवेदनहीन बनी हुई है और कारपोरेट्स के पक्ष में इन कानूनों को पारित कराने के लिए जैसे राज्यसभा में लोकतंत्र की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया था (अल्पमत के बावजूद राज्यसभा टीवी को ‘म्यूट’ कर मेज थपथपा कर पारित करा दिया, वोटिंग की मांग को ठुकरा दिया). उसी प्रकार वह आंदोलन के खिलाफ नित्य नया मिथ्या प्रचार चला रही है, फूट डालने की हर कोशिश चला रही है. इस किसान आंदोलन के बारे में कभी ‘विपक्षी पार्टियों द्वारा प्रायोजित’, ‘केवल पंजाब के किसानों का’, ‘बड़े फार्मरों का’, ‘आंदोलन में खालिस्तानियों की घुसपैठ’, तो कभी ‘आंदोलन में नक्सलवादियों-माओवादियों की घुसपैठ’ आदि-इत्यादि प्रचार सरकार, भाजपा, गोदी मीडिया का जैसे काम बन गया है.


लेकिन भारत का यह ऐतिहासिक किसान आंदोलन अपनी खेती व जीविका बचाने के लिए एकजुट है और आगे बढ़ता जा रहा है. 8 दिसबंर के भारत बंद के बाद यह अखिल भारतीय स्तर पर निंरतर फैलता जा रहा है. देश का मजदूर वर्ग, तमाम सेवाकर्मी, मध्यवर्ग व उपभोक्ता वर्ग यह समझ रहा है कि इन कानूनों को लागू होने के बाद उन्हें खाद्य पदार्थ अकल्पनीय महंगे दामों पर मिलेंगे और गरीबों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि जब खाद्यान्नों की सरकारी खरीद नहीं होगी तो जन वितरण प्रणाली से सस्ते दर पर खाद्यान्न वितरण भी प्रभावित होगा और इन वर्गों का किसान- आंदोलन के प्रति समर्थन बढ़ता जा रहा है.


कर्ज में डूबकर साढ़े तीन लाख किसानों की आत्महत्याओं के बाद हम किसान संगठनों ने किसानों का कर्ज खत्म करने एवं खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों की फसलों की कीमत स्वमीनाथन कमीशन की अनुशंसा के अनुसार सी 2+ 50 प्रतिशत यानी जिसमें फसलों की लागत में खाद-बीज-सिंचाई-मजदूरी के साथ-साथ जमीन का किराया, पारिवारिक श्रम की कीमत यानी कुल लागत शामिल हो (जिसका वादा भाजपा ने 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में किया था) देने की मांग की थी. लेकिन मोदी सरकार ने तो जो कुछ भी बचा-खुचा था, उसे छीन लेने और खेत-खेती पर कारपोरेट बर्चस्व थोप देने का कानून पारित कर दिया. बिहार की नीतीश-भाजपा सरकार ने बिहार एमपीएमसी ऐक्ट को 2006 में समाप्ति की घोषणा कर और लगातार कई बरस से एक एमएसपी पर किसानों-बटाइदारों के धान-गेहूं-मक्के की खरीद से पीछा छुड़ाकर अपने किसान विरोधी चेहरे को ही उजागर किया है. हमारी मांग है कि नीतीश सरकार फिर से मंडी व्यवस्था बहाल करे और सभी किसानों से धान खरीद की गारंटी करे.


किसान भाइयो, हमें देश के किसान आंदोलन को और मजबूत बनाना होगा और पंजाब-हरियाणा के संघर्षरत किसान भाइयों को ताकत देना होगा. बिहार के गांव-गांव से किसानों-मजदूरों, छात्र-नौजवानों, महिलाओं, बुद्धिजीवियों, छोटे दुकानदारों व समाज के विभिन्न वर्गों-तबकों को संगठित करना होगा. किसान हित, समाज हित व देशहित में मोदी सरकार को इन काले कानूनों को वापस लेना होगा. आइए, किसान आंदोलन को तेज करें.


29 दिसंबर कोे राजभवन किसान मार्च में लाखों की तादाद में पटना चलें.

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.